कोशिका : एक संक्षिप्त परिचय

 कोशिका - कोशिका  सजीवों के शरीर की रचनात्मक और क्रियात्मक इकाई हैI  मानव शरीर असंख्य सूक्ष्म इकाईयों से मिलकर बना है, जिन्हें कोशिकाएँ कहा जाता है।


  • कोशिका शरीर का सूक्ष्मतम रूप है।
  • यह शरीर की एक मूलभूत रचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है, जो स्वतंत्र रूप से जीवन की क्रियाओं को चलाने की क्षमता रखती है।
  • शरीर के विभिन्न अंगों की कोशिकाओं में भिन्नता होती है, परंतु समस्त कोशिकाओं की मूलभूत संरचना एकसमान ही होती है।
  • ये इतनी सूक्ष्म होती हैं, कि इन्हें बिना माइक्रोस्कोप के देख सकना सम्भव नहीं है।
  • इन्हें स्टेन करने के पश्चात् स्लाइड पर स्थित करके ही देखा जा सकता है। स्टेन करने से कोशिका के भिन्न-भिन्न भाग भिन्न-भिन्न रंग ग्रहण कर लेते हैं तथा सभी स्पष्ट एवं एक-दूसरे से भिन्न दिखाई देने लगते हैं।
  • कोशिका की रचना के अंतर्गत कई-एक सम्मिलित अंग हैं, इन्हीं अंगों के सामूहिक रूप को कोशिका कहते हैं।
  • कार्यों की विभिन्नता के कारण कोशिकाओं के आकार एवं आकृति में अंतर होता है, परंतु कुछ रचनात्मक विशिष्ट गुण उन सभी में समान रहते हैं।
  • यह स्वत: जनन की सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न पदार्थों का वह छोटे-से-छोटा संगठित रूप है जिसमें वे सभी क्रियाएँ होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहतें हैं।
  • 'कोशिका' का अंग्रेजी शब्द सेल  लैटिन भाषा के 'शेलुला' शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ 'एक छोटा कमरा' है।
  • कुछ सजीव जैसे जीवाणुओं के शरीर एक ही कोशिका से बने होते हैं, उन्हें एककोशकीय जीव कहते हैं जबकि कुछ सजीव जैसे मनुष्य का शरीर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है उन्हें बहुकोशकीय सजीव कहते हैं।
  • कोशिका की खोज रॉबर्ट हूक ने 1665ई० में किया। 1839 ई० में श्लाइडेन तथा श्वान ने कोशिका सिद्धान्त प्रस्तुत किया जिसके अनुसार सभी सजीवों का शरीर एक या एकाधिक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है तथा सभी कोशिकाओं की उत्पत्ति पहले से उपस्थित किसी कोशिका से ही होती है।
Some More Points
  • सजीवों की सभी जैविक क्रियाएँ कोशिकाओं के भीतर होती हैं। कोशिकाओं के भीतर ही आवश्यक आनुवांशिक सूचनाएँ होती हैं जिनसे कोशिका के कार्यों का नियंत्रण होता है तथा सूचनाएँ अगली पीढ़ी की कोशिकाओं में स्थानान्तरित होती हैं।
  • कोशिकाओं का विधिवत अध्ययन कोशिका विज्ञान  या 'कोशिका जैविकी'  कहलाता है।
कोशिका : इतिहास
  • रोबर्ट हुक ने 1665 में बोतल की कार्क की एक पतली परत के अध्ययन के आधार पर मधुमक्खी के छत्ते जैसे कोष्ठ देखे और इन्हें कोशा नाम दिया। यह तथ्य उनकी पुस्तक माइक्रोग्राफिया में छपा। राबर्ट हुक ने कोशा-भित्तियों के आधार पर कोशा शब्द प्रयोग किया।
  • 1674 एंटोनी वॉन ल्यूवेन्हॉक ने जीवित कोशा का सर्वप्रथम अध्ययन किया।
  • 1831 में रॉबर्ट ब्राउन ने कोशिका में 'ककेंद्रक एवं केंद्रिका' का पता लगाया।
  • तदरोचित नामक वैज्ञानिक ने 1824 में कोशावाद  का विचार प्रस्तुत किया, परन्तु इसका श्रेय वनस्पति-विज्ञान-शास्त्री श्लाइडेन और जन्तु-विज्ञान-शास्त्री श्वान  को दिया जाता है जिन्होंने ठीक प्रकार से कोशावाद को (1839 में) प्रस्तुत किया और बतलाया कि 'कोशाएँ पौधों तथा जन्तुओं की रचनात्मक इकाई हैं।'
  • 1855 : रुडॉल्फ विर्चो ने विचार रखा कि कोशिकाएँ सदा कोशिकाओं के विभाजन से ही पैदा होती हैं।
  • 1953: वाट्सन और क्रिक ने डीएनए के 'डबल-हेलिक्स संरचना' की पहली बार घोषणा की।
  • 1981: लिन मार्गुलिस  ने कोशिका क्रम विकास में 'सिबियोस'  पर शोधपत्र प्रस्तुत किया।
कोशिकाओं का वर्गीकरण:-
कोशिकाएं मुख्य रूप से  दो प्रकार की होती हैं-  1. प्रोकार्योटिक कोशिका   2.  यूकेरियोटिक कोशिका
  1. प्रोकर्योटिक कोशिका
  • संगठित नाभिक का अभाव और आनुवंशिक पदार्थ न्यूक्लियोड के रूप में पायी जाती है |
  • झिल्लीयुक्त  ऑर्गेनेल क्षेत्र का अभाव
  • रिक्तिका (Vacuole) आम तौर पर पाए जाते हैं |
  • डीएनए वृत्ताकार और क्रोमोसोम में नहीं पाया जाता है |
  • कोशिका द्रव्य (cytoplasm) में ट्रांसक्रिप्शन और ट्रांसलेशन दोनों होते हैं|
  • रिबोसोम केवल 70 एस प्रकार के होते  हैं |
  • माईटोकोंड्रिया और क्लोरोप्लास्ट पाया जाता है |
  1. यूकेरियोटिक कोशिका
  • झिल्ली सहित संगठित नाभिक पाया जाता है |
  • झिल्लीयुक्त ऑर्गेनल्स जैसे एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम, माईटोकोंड्रिया पाया जाता है
  • रिक्तिका (Vacuole) आम तौर पर पाए जाते हैं |
  • डीएनए रेखीय और क्रोमोसोम में पाया जाता है |
  • कोशिका द्रव्य (cytoplasm) में ट्रांसलेशन और नाभिक में ट्रांसक्रिप्शन होता हैं |
  • रिबोसोम 70 एस और 80 एस प्रकार होते हैं
  • माईटोकोंड्रिया पाया जाता है और क्लोरोप्लास्ट पादप कोशिका में पाया जाता है |
कोशिका संरचना
  • कोशिकाएँ सजीव होती हैं तथा वे सभी कार्य करती हैं, जिन्हें सजीव प्राणी करते हैं।
  • इनका आकार अतिसूक्ष्म तथा आकृति गोलाकार, अंडाकार, स्तंभाकार, रोमकयुक्त, कशाभिकायुक्त, बहुभुजीय आदि प्रकार की होती है।
  • ये जेली जैसी एक वस्तु द्वारा घिरी होती हैं। इस आवरण को कोशिकावरण (cell membrane) या कोशिका-झिल्ली कहते हैं यह झिल्ली अवकलीय पारगम्य (selectively permeable) होती है I
  • इसे कभी-कभी 'जीवद्रव्य कला' (plasma membrane) भी कहा जाता है। इसके भीतर निम्नलिखित संरचनाएँ पाई जाती हैं:-
(1) केंद्रक एवं केंद्रिका
(2) जीवद्रव्य
(3) गोल्गी सम्मिश्र या गोल्गी यंत्र
(4) कणाभ सूत्र
(5) अंतर्प्रद्रव्य डालिका
(6) गुणसूत्र (पितृसूत्र) एवं जीन
(7) राइबोसोम तथा सेन्ट्रोसोम
(8) लवक
1.केंद्रक
  • एक कोशिका में सामान्यतः एक ही केंद्रक (nucleus) होता है, किंतु कभी-कभी एक से अधिक केंद्रक भी पाए जाते हैं।
  • कोशिका के समस्त कार्यों का यह संचालन केंद्र होता है। जब कोशिका विभाजित होती है तो इसका भी विभाजन हो जाता है।
  • केंद्रक कोशिका के भीतर एक तरल पदार्थ कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) में प्राय: तैरता रहता है।
  •  यह अधिकतर लगभग मध्यभाग में ही स्थित होता है। कुछ कोशिकाओं में इसकी स्थिति आधारीय (basal) और कुछ में सीमांतीय (peripheral) भी होती है।
  • केंद्रक की आकृति गोलाकार, वर्तुलाकार या अंडाकार होती है। कभी-कभी यह बेलनाकार, दीर्घवृत्ताकार, सपात, शाखान्वित, नाशपाती जैसा, भालाकार आदि स्वरूपों का भी हो सकता है।
  • इसके भीतर केंद्रकरस (nuclear sap) केंद्रिका  तथा गुणसूत्र  पाए जाते हैं।
  • केंद्रक के आवरण को केंद्रककला (nuclear membrance or nucleolemma) कहते हैं।
  1. केंद्रिका
  • प्रत्येक केंद्रक में एक या अधिक केंद्रिकाएँ पाई जाती हैं।
  • कोशिका विभाजन की कुछ विशेष अवस्था में केंद्रिका लुप्त हो जाती, किंतु बाद में पुन: प्रकट हो जाती है।
  • केंद्रिका के भीतर रिबोन्यूक्लीइक अम्ल (ritioncleric acid or RNA) तथा कुछ विशेष प्रकार के एंज़ाइम अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।
  • केंद्रिका सूत्रण (mitosis) या सूत्री विभाजन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
  1. जीवद्रव्य
  • यह एक गाढ़ा तरल पदार्थ होता है जो स्थानविशेष पर विशेष नामों द्वारा जाना जाता है; जैसे, द्रव्यकला (plasma membrane) तथा केंद्रक के मध्यवर्ती स्थान में पाए जाने वाले जीवद्रव्य को कोशिकाद्रव्य (cyt plasm) और केंद्रक झिल्ली (nuclear membrane) के भीतर पाए जाने वाले जीवद्रव्य को केंद्रक द्रव्य (nucleoplasm) कहते हैं।
  • कोशिका का यह भाग अत्यंत चैतन्य और कोशिका की समस्त जैवीय प्रक्रियाओं का केंद्र होता है। इसे इसीलिए 'सजीव' (living) कहा जाता है।
  • जीव वैज्ञानिक इसे 'जीवन का भौतिक आधार' (physcial basis of life) नाम से संबोधित करते हैं।
  • जीवद्रव्य का निर्माण कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन तथा अनेक कार्बनिक (organic) तथा अकार्बनिक (inorganic) पदार्थो द्वारा हुआ होता है।
  • इसमें जल की मात्रा लगभग 80% प्रोटीन 15%, वसाएँ 3% तथा कार्बोहाइड्रेट 1% और अकार्बनिक लवण की 1 होती है।
  • जीवद्रव्यों के कई प्रकार होते हैं, जैसे कोलाइड (colloid), कणाभ (granular), तंतुमय (fibrillar), जालीदार (reticular), कूपिकाकार (alveolar), आदि।
  1. गोल्गी सम्मिश्र या यंत्र
  • इस अंग का यह नाम इसके खोजकर्ता कैमिलो गोल्गी, के नाम पर पड़ा है, जिन्होंने 1898 में सर्वप्रथम इसकी खोज की।
  • यह अंग साधारणतः केंद्रक के समीप, अकेले या समूहों में पाया जाता है।
  • इसकी रचना तीन तत्वों (elements) या घटकों (components) द्वारा हुई होती है : सपाट कोश (flattened sacs), बड़ी बड़ी रिक्तिकाएँ (large vacueles) तथा आशय (vesicles)।
  • यह एक प्रकार के जाल (network) जैसा दिखलाई देता है। इनका मुख्य कार्य कोशिकीय स्रवण (cellular secretion) और प्रोटीनों, वसाओं तथा कतिपय किण्वों (enzymes) का भडारण करना (storage) है।
  1. कणाभसूत्र
  • ये कणिकाओं (granules) या शलाकाओं (rods) की आकृतिवाले होते हैं।
  • ये अंगक (organelle) कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) में स्थित होते हैं।
  • इनकी संख्या विभिन्न जंतुओं में पाँच लाख तक हो सकती है।
  • इनका आकार 1/2 माइक्रॉन से लेकर 2 माइक्रॉन के बीच होता है।
  • विरल उदाहरणों (rare cases) में इनकी लंबाई 40 माइक्रॉन तक हो सकती है। इनके अनेक कार्य बतलाए गए हैं, जो इनकी आकृति पर निर्भर करते हैं।
  • तथापि इनका मुख्य कार्य कोशिकीय श्वसन (cellular respiration) बतलाया जाता है।
  • इन्हें कोशिका का 'पावर प्लांट' (power plant) कहा जाता है, क्योंकि इनसे आवश्यक ऊर्जा (energy) की आपूर्ति होती रहती है।
  1. अंतर्प्रद्रव्य जालिका (endoplasmic reticulum)
  • यह जालिका कोशिकाद्रव्य (cytoplasm) में आशयों (vesicles) और नलिकाओं (tubules) के रूप में फैली रहती है।
  • इसकी स्थिति सामान्यतः केंद्रकीय झिल्ली (nuclear membrane) तथा द्रव्यकला (plasma membrane) के बीच होती है, किंतु यह अक्सर संपूर्ण कोशिका में फैली रहती है।
  • यह जालिका दो प्रकार की होती है : चिकनी सतहवाली (smooth surfaced) और खुरदुरी सतहवाली (rough surfaced)।
  • इसकी सतह खुरदुरी इसलिए होती है कि इस पर राइबोसोम (ribosomes) के कण बिखरे रहते हैं।
  • इसके अनके कार्य बतलाए गए हैं, जैसे यांत्रिक आधारण (mechanical support), द्रव्यों का प्रत्यावर्तन (exchange of materials), अंत: कोशिकीय अभिगमन (intracellular transport), प्रोटोन संश्लेषण (protein synthesis) इत्यादि।
  1. गुणसूत्र (chromosomes)
  • यह शब्द क्रोम (chrom) तथा सोमा (soma) शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है : रंगीन पिंड (colour bodies)।
  • गुणसूत्र केंद्रकों के भीतर जोड़ों (pairs) में पाए जाते हैं और कोशिका विभाजन के साथ केंद्रक सहित बाँट जाया करते हैं।
  • इनमें स्थित जीवों की पूर्वजों के पैत्रिक गुणों का वाहक कहा जाता है।
  • इनकी संख्या जीवों में निश्चित होती है, जो एक दो जोड़ों से लेकर कई सौ जोड़ों तक हो सकती है।
  • इनका आकार 1 माइक्रॉन से 30 माइक्रॉन तक (लंबा) होता है। इनकी आकृति साधारणतः अंग्रेजी भाषा के अक्षर S जैसी होती हैं।
  • इनमें न्यूक्लिओ-प्रोटीन (nucleoprotein) मुख्य रूप से पाए जाते हैं।
  • पितृसूत्रों के कुछ विशेष प्रकार भी पाए जाते हैं, जिन्हें लैंपब्रश पितृसूत्र (lampbrush chromosomes) और पोलोटीन क्रोमोसोम (polytene chromosomes) की संज्ञा दी गई है।
8.जीन (gene)
  • जीनों को पैत्रिक गुणों का वाहक (carriers of hereditary characters) माना जाता है।
  • क्रोमोसोम का निर्माण हिस्टोन प्रोटीन तथा डिऑक्सीराइबोन्यूक्लिक ऐसिड (DNA) तथा राइबोन्यूक्लिक ऐसिड (RNA) से मिलकर हुआ होता है।
  • जीन का निर्माण इन्हीं में से एक, डी॰ एन॰ ए॰ द्वारा होता है। कोशिका विभाजनों के फलस्वरूप जब नए जीव के जीवन का सूत्रपात होता है, तो यही जीन पैतृक एवं शरीरिक गुणों के साथ माता पिता से निकलकर संततियों में चले जाते हैं।
  • यह आदान प्रदान माता के डिंब (ovum) तथा पिता के शुक्राणु (sperms) में स्थित जीनों के द्वारा संपन्न होता है।
  • सन्‌ 1970 के जून मास में अमरीका स्थित भारतीय वैज्ञानिक श्री हरगोविंद खुराना को कृत्रिम जीन उत्पन्न करने में अभूतपूर्व सफलता मिली थी।
  • इन्हें सन्‌ 1978 में नोबेल पुरस्कार मिला था।
  1. रिबोसोम (ribosomes)
  • सूक्ष्म गुलिकाओं के रूप में प्राप्त इन संरचनाओं को केवल इलेक्ट्रॉन माइक्रॉस्कोप के द्वारा ही देखा जा सकता है।
  • इनकी रचना 50% प्रोटीन तथा 50% आर॰ एन॰ ए॰ द्वारा हुई होती है।
  • ये विशेषकर अंतर्प्रद्रव्य जालिका के ऊपर पाए जाते हैं। इनमें प्रोटीनों का संश्लेषण होता है।
10.सेंट्रोसोम (centrosomes)–
  • ये केंद्रक के समीप पाए जाते हैं।
  • इनके एक विशेष भाग को सेंट्रोस्फीयर (centrosphere) कहते हैं, जिसके भीतर सेंट्रिओलों (centrioles) का एक जोड़ा पाया जाता है।
  • कोशिका विभाजन के समय ये विभाजक कोशिका के ध्रुव (pole) का निर्धारण और कुछ कोशिकाओं में कशाभिका (flagella) जैसी संरचनाओं को उत्पन्न करते हैं।
  1. लवक (plastids)
  • लवक अधिकतर पौधों में ही पाए जाते हैं। ये एक प्रकार के रंजक कण (pigment granules) हैं, जो जीवद्रव्य (protoplasm) में यत्र तत्र बिखरे रहते हैं।
  • क्लोरोफिल (chlorophyll) धारक वर्ण के लवक को हरित्‌ लवक (chloroplas) कहा जाता है। इसी के कारण वृक्षों में हरापन दिखलाई देता है।
  • क्लोरोफिल के ही कारण पेड़ पौधे प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) करते हैं।